सुकून जुदा हुए….

“कल्ब़ से सुकून जुदा हुए अरसो हो गए..
हाँ मैने भी कभी मुहब्बत जो किया था..||

Advertisements

तो क्या होगा…

“”बरसात के मौसम में ग़र, बदन से बदन टकराए तो क्या होगा,

तेरी दो खूबसूरत आँखों में, हम नजर आएं तो क्या होगा””

“” भीगेगें दोनो बेलिहाज़ जमीं पर, वो चाँद घटाओं में छुप जाए तो क्या होगा..||

महबूब ही तोड़ते हैं…

“महबूब ही तोड़ते हैं दिल पत्थर मारके कभी-कभी,
बेकस़ कर देते हैं जिंदगी से निकालके कभी-कभी|

बहोत गुमान न करना महबूब के मुहब्बत पे तुम भी,
जां छिड़कने वाले बेजां करते हैं जां निकालके कभी-कभी|

पहली मुहब्बत बेशक ही कुछ पल को दिलनशी लगे बहोत,
कुछ लम्हातों में गुजर जाते हैं पल बहारके कभी-कभी|

जिसके बगैर एक लम्हा बिताना अजाब़े-जहां लगे ” रोशन”,
तरसना पड़ जाता है उनके एक दीदार को कभी-कभी…|

22 July….

सन 1862 में, राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने अपने मंत्रिमंडल को मुक्ति उद्घोषणा का प्रारंभिक मसौदा प्रस्तुत किया।

बेजुबां की तड़प….

लौट आए वह परिन्दे आशियाने में अब,

जो शाम तलक मंजिल की तलाश में थे,

कुछ ने हासिल किया तिनका पेट के खातिर,

मगर कुछ बदनसीब तो खाली हाथ ही थे,

वो बेजुबां जो ठहरे किसी से मांगते भी कैसे,

शहर में मशरुफ़ियत-ओ-बंद-किवाड़ ही थे,

तिशऩगी से कुछ परिन्दे तो बदहाल हो गए,

कहीं मिले भी ग़र घड़े पर वह बे-आब ही थे..|

दिल के पार कर दिया….

हम फरेबी नहीं थे, फरेब को जान न पाए,

हम मासूम थे खुदा, उन्हें पहचान न पाए,

बड़ी मुहब्बत से उसने, मुझे तबाह कर दिया,

हम तो बेखता थे मगर, हमें सज़ा दे दिया,

क्या कुसूर है मेरा, उसने बताया भी नहीं मुझे,

बस आहिस्ता-आहिस्ता तीर, मेरे दिल के पार कर दिया..||

आसमां का चाँद……

वो दिलकश-ओ-पाक भी है, वो अमलन बेदाग भी है,

वो नूर-ए-जमीं है खुदा, वो आसमां का चाँद भी है,

वह फिजाओं में बह रही , महक-ए-गुलाब भी है,

जो मेरी रूह को सुकून दे, वह शबे-शबाब़ भी है…|